लोकतंत्र की छाती पर
ये जस्न मनाते गिद्ध-स्वान
नाचे-गाएँ, कूदे-फांदें,
मद में झुमें, ये बेईमान ।।
करते नर्तन निज तन उघाड़
करें लोकतंत्र की चीरफाड़
कर चीर-फाड नोचें-भींचें
कर-भेद उदर अंतड खींचे ।।
गरदन दबोच आँखे टींचे
बोले गर कोई, जिव्हा खींचें
सरपरस्त जिनको माना वो ही
आज हमारा तन नोचें ।।
चहुँओर मचा हे हाहाकार
घुटने लगी अब हर पुकार
पर कौन सुने? सुनायें किसे?
जब बहरे बने हैं पहरेदार ।।
ओपी सुमन
ये जस्न मनाते गिद्ध-स्वान
नाचे-गाएँ, कूदे-फांदें,
मद में झुमें, ये बेईमान ।।
करते नर्तन निज तन उघाड़
करें लोकतंत्र की चीरफाड़
कर चीर-फाड नोचें-भींचें
कर-भेद उदर अंतड खींचे ।।
गरदन दबोच आँखे टींचे
बोले गर कोई, जिव्हा खींचें
सरपरस्त जिनको माना वो ही
आज हमारा तन नोचें ।।
चहुँओर मचा हे हाहाकार
घुटने लगी अब हर पुकार
पर कौन सुने? सुनायें किसे?
जब बहरे बने हैं पहरेदार ।।
ओपी सुमन