हे ईश्वर मैं उस हर नियामत के लिए तेरा शुक्रगुजार हूँ जो तूने मुझे अता कि हैं

मेरे लिए सत्य यह है इस वक्त आप इसे पढ़ रहे हैं.......... धन्यवाद धन्यवाद धन्यवाद

Wednesday, August 2, 2017

लोकतंत्र की छाती पर
ये जस्न मनाते गिद्ध-स्वान
नाचे-गाएँ, कूदे-फांदें,
मद में झुमें, ये बेईमान ।।

करते नर्तन निज तन उघाड़
करें लोकतंत्र की चीरफाड़
कर चीर-फाड नोचें-भींचें
कर-भेद उदर अंतड खींचे ।।

गरदन दबोच आँखे टींचे
बोले गर कोई, जिव्हा खींचें
सरपरस्त जिनको माना वो ही
आज हमारा तन नोचें ।।

चहुँओर मचा हे हाहाकार
घुटने लगी अब हर पुकार
पर कौन सुने? सुनायें किसे?
जब बहरे बने हैं पहरेदार ।।

ओपी   सुमन

Monday, July 31, 2017

लोकतंत्र का दमन

वीभत्स रस कविता
      एक प्रयास


लोकतंत्र की छाती पर
ये जस्न मनाते गिद्ध-स्वान
करें चीर-फाड
नोचें-भींचें
कर-भेद उदर
अंतड खींचे
गरदन दबाये
आँखे टींचे
बहे रक्तधार
निज तन सींचें
करते नर्तन
निज़ तन-उघाड़
सुनता हूँ मैं
क्रन्दन रुदन
व् चींख-चिंघाड़
चहुँओर मचा है
हाहाकार
सुनेगा कौन?
सुनायें किसे?
जब बहरे बने हैं
पहरेदार...........

ओपी   सुमन

Monday, June 30, 2014

मन की वेदना


 
 कोरा बर्तन सा वो मन
लिपटा माँ के आँचल में
भरा गया प्यार व् ममता से
पिता के स्नेहल सहारे से
दादी की लाठी से
दादु के चश्मे से
बहन के नखरों से
सिंचित ये मन
आज
समय की तपन से
मजबूरियों की उबलन से
वाष्पित वो मन
आज शेष है खुरचन
opsuman

Monday, May 19, 2014

 


ghutan

अरमानो का बूचड़ खाना, बना रहे हैं लोग
           बच भाई ,बचके रहना
संभल के चल ऐ मेरे साथी, फंसा रहे हैं लोग
         चल भाई, संभल के चलना
सब्जबाग सुन्दर सपनो का, दिखा रहें है लोग
            देख  भाई, देख के चलना
उसी बाग़ को बेदरदी से, जला रहें हैं लोग
             सुन भाई, संभल के रहना
लिए बगल में छुरी प्यार से, डरा रहें हैं लोग
               डर भाई,  डर के रहना
इक दूजे का गला यहाँ पर, दबा रहे है लोग
               चुप भाई, चुप ही रहना
देके लगाम खुद अपनी, अब वे चला रहें है लोग
               चल भाई, चलते रहना







Saturday, May 17, 2014




कमल खिला है भाग्य का, शीश चढ़ा हे राज
अब आशा है हिन्द की, मोदी सर, सरताज i
मोदी सर सरताज़, लाज़ हिन्द की रखना
भ्रष्टो और घोटालो को, देश से दूर ही रखना i
'सुमन' अभिलाषा युथ की स्वाभिमान रक्षित रहे
सोने की चिड़िया हिन्द, गर्व पुनः अर्जित करे i

ओ पी सुमन

Wednesday, May 14, 2014



विरह वेदना मरुधरा सी,
पिया मिलन बिन रही है प्यासी i
गीत मिलन के कौन है गाता,
सुन हिये में छाई उदासी ii

opsuman

Tuesday, May 13, 2014


चेहरे बदल जीते बिना जज्बात यहाँ पर लोग
करते नहीं शिकवा कटा कर गला यहाँ पर लोग

बेनज़र कर दिया सबको फ़ितरते यार ये उनकी
बसाकर आस्तीं मैं सांप क्यों रोते यंहा पर लोग

बनाकर दायरा बैठे घुटते यहाँ पर लोग
दबाकर फ़ितरते-गैरत जीते यहाँ पर लोग

जगाये कौन यहाँ उनको जो जागते-सोते
भरोसे भाग्य के बैठे कोसे यहाँ पर लोग

जमानेहाल बदलजाये ये मुमकिन हो नहीं सकता
जबतलक तु नहीं बदले ये करम हो नहीं सकता

बदलकर सीरतें अपनी दिखा दो इस जन्हा को तुम
करलो यकीं खुद पर बिना ये हो नहीं सकता

दिखा दो आसमां को तुम कर सुराख़ हाथो से
तोड़ दो बेड़ियां खुद की पड़ी थी हाथ सालों से

ओ पी सुमन- १२-५-२०१४