हे ईश्वर मैं उस हर नियामत के लिए तेरा शुक्रगुजार हूँ जो तूने मुझे अता कि हैं

मेरे लिए सत्य यह है इस वक्त आप इसे पढ़ रहे हैं.......... धन्यवाद धन्यवाद धन्यवाद

Monday, May 19, 2014

 


ghutan

अरमानो का बूचड़ खाना, बना रहे हैं लोग
           बच भाई ,बचके रहना
संभल के चल ऐ मेरे साथी, फंसा रहे हैं लोग
         चल भाई, संभल के चलना
सब्जबाग सुन्दर सपनो का, दिखा रहें है लोग
            देख  भाई, देख के चलना
उसी बाग़ को बेदरदी से, जला रहें हैं लोग
             सुन भाई, संभल के रहना
लिए बगल में छुरी प्यार से, डरा रहें हैं लोग
               डर भाई,  डर के रहना
इक दूजे का गला यहाँ पर, दबा रहे है लोग
               चुप भाई, चुप ही रहना
देके लगाम खुद अपनी, अब वे चला रहें है लोग
               चल भाई, चलते रहना







Saturday, May 17, 2014




कमल खिला है भाग्य का, शीश चढ़ा हे राज
अब आशा है हिन्द की, मोदी सर, सरताज i
मोदी सर सरताज़, लाज़ हिन्द की रखना
भ्रष्टो और घोटालो को, देश से दूर ही रखना i
'सुमन' अभिलाषा युथ की स्वाभिमान रक्षित रहे
सोने की चिड़िया हिन्द, गर्व पुनः अर्जित करे i

ओ पी सुमन

Wednesday, May 14, 2014



विरह वेदना मरुधरा सी,
पिया मिलन बिन रही है प्यासी i
गीत मिलन के कौन है गाता,
सुन हिये में छाई उदासी ii

opsuman

Tuesday, May 13, 2014


चेहरे बदल जीते बिना जज्बात यहाँ पर लोग
करते नहीं शिकवा कटा कर गला यहाँ पर लोग

बेनज़र कर दिया सबको फ़ितरते यार ये उनकी
बसाकर आस्तीं मैं सांप क्यों रोते यंहा पर लोग

बनाकर दायरा बैठे घुटते यहाँ पर लोग
दबाकर फ़ितरते-गैरत जीते यहाँ पर लोग

जगाये कौन यहाँ उनको जो जागते-सोते
भरोसे भाग्य के बैठे कोसे यहाँ पर लोग

जमानेहाल बदलजाये ये मुमकिन हो नहीं सकता
जबतलक तु नहीं बदले ये करम हो नहीं सकता

बदलकर सीरतें अपनी दिखा दो इस जन्हा को तुम
करलो यकीं खुद पर बिना ये हो नहीं सकता

दिखा दो आसमां को तुम कर सुराख़ हाथो से
तोड़ दो बेड़ियां खुद की पड़ी थी हाथ सालों से

ओ पी सुमन- १२-५-२०१४

Wednesday, May 7, 2014



अश्क आँखों में तिरते रहे,
पलकों से मिल बिछड़ते रहे
लुढ़कते हुए रुखसारों से
तेरी तस्वीर पे गिरते रहे

रात भर चाँद में अक्श अपना ढूंढ़ते रहे
चाँदनी रात में दामन अपना भिगोते रहे
तुमने कहा था चाँद मेरा दिल चाँदनी हो तुम
इसी भरम में हम खुद से बिछड़ते रहे

नज़र सितारों पे  कहेंगे मेरा चाँद हो तुम
मन में छिपा के उनको कहेंगे चाँदनी हो तुम
जमाना-ए-दस्तूर याद रखना सुमन
चाँदनी रहेगी सदा, इसी भ्रम में न रहना तुम

Monday, May 5, 2014


मैं अचल, पर जड़ नहीं
संवेदनायें गतिशील मुझमे
क्या नहीं देता तुम्हे
अपना सीना चीर
सोना, चाँदी, हीरे
भौतिक से अध्यात्म
सब कुछ दिया तुम्हे
जीवन रेखा
मेरे ह्रदय से निकल
सींचती तुम्हे
मेघ आलिंगन से
हर्षित ह्रदय तर करता तुम्हे
मेरी ऊर्जा बहती है तुझमे
संवेदना बन पलती है तुझमे
मैं अचल हूँ पर अजर अमर नहीं
जीवन ज्योति नित घटती
मेरा श्रंगार लूटते  तुम
वस्त्रहीन करने पर तुले तुम
कब तक सहूँ, मैं अचल
वेदना सहने को मजबूर
कैसे प्रकट करूँ अपनी वेदना
तुमने तो भौतिकवादी अभेद्य
आवरण ओढ़ लिया
अंदर अँधेरा कर लिया
याद है केदारनाथ
जब मैं फूटकर रोया था
पर तुम्हे मेरे आँशु नहीं दिखते
अब भी लगे हो काटने मुझे
छोड़ते हो जहरीला धुँआ
दम घुटने लगा है मेरा
कब तक सहूँ वेदना
अब डर लगता है
कहीं रो न पडूँ मैं
opsuman

Saturday, May 3, 2014

चित्र साभार गूगल

संवेदनहीनता 

सामने बनती बहुमंज़िला इमारत
मैं देखता हर रोज़ वही क्रम
सेकड़ो मज़दूर लग जाते
मशीन की तरह अपने तन से
बिना भय के चढ़ जाते
बल्लियों पर
जान की परवाह किसे
मन में है सिर्फ दिहाड़ी i
कोई हादसा होता
दौड़ पड़ते सभी साथी
सँभालने को
मैनेजर दौड़ता हांफता सा
खोजता हाज़िरी रजिस्टर
में नाम पीड़ित का
मिटा देता नामोनिशान उस पाने का
घायल मजदूर बेनाम पहुंचा दिया जाता
खैराती दवाखाने...

ओ पी सुमन