वीभत्स रस कविता
एक प्रयास
लोकतंत्र की छाती पर
ये जस्न मनाते गिद्ध-स्वान
करें चीर-फाड
नोचें-भींचें
कर-भेद उदर
अंतड खींचे
गरदन दबाये
आँखे टींचे
बहे रक्तधार
निज तन सींचें
करते नर्तन
निज़ तन-उघाड़
सुनता हूँ मैं
क्रन्दन रुदन
व् चींख-चिंघाड़
चहुँओर मचा है
हाहाकार
सुनेगा कौन?
सुनायें किसे?
जब बहरे बने हैं
पहरेदार...........
ओपी सुमन
एक प्रयास
लोकतंत्र की छाती पर
ये जस्न मनाते गिद्ध-स्वान
करें चीर-फाड
नोचें-भींचें
कर-भेद उदर
अंतड खींचे
गरदन दबाये
आँखे टींचे
बहे रक्तधार
निज तन सींचें
करते नर्तन
निज़ तन-उघाड़
सुनता हूँ मैं
क्रन्दन रुदन
व् चींख-चिंघाड़
चहुँओर मचा है
हाहाकार
सुनेगा कौन?
सुनायें किसे?
जब बहरे बने हैं
पहरेदार...........
ओपी सुमन