हे ईश्वर मैं उस हर नियामत के लिए तेरा शुक्रगुजार हूँ जो तूने मुझे अता कि हैं

मेरे लिए सत्य यह है इस वक्त आप इसे पढ़ रहे हैं.......... धन्यवाद धन्यवाद धन्यवाद

Monday, July 31, 2017

लोकतंत्र का दमन

वीभत्स रस कविता
      एक प्रयास


लोकतंत्र की छाती पर
ये जस्न मनाते गिद्ध-स्वान
करें चीर-फाड
नोचें-भींचें
कर-भेद उदर
अंतड खींचे
गरदन दबाये
आँखे टींचे
बहे रक्तधार
निज तन सींचें
करते नर्तन
निज़ तन-उघाड़
सुनता हूँ मैं
क्रन्दन रुदन
व् चींख-चिंघाड़
चहुँओर मचा है
हाहाकार
सुनेगा कौन?
सुनायें किसे?
जब बहरे बने हैं
पहरेदार...........

ओपी   सुमन

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