हे ईश्वर मैं उस हर नियामत के लिए तेरा शुक्रगुजार हूँ जो तूने मुझे अता कि हैं

मेरे लिए सत्य यह है इस वक्त आप इसे पढ़ रहे हैं.......... धन्यवाद धन्यवाद धन्यवाद

Sunday, March 30, 2014

संतोष-सेतु जब टूट जाता है तब इच्छा का बहाव अपरिमित हो जाता है। मतवालों को मद का स्मरण करना उन्हें मदांध बनाता है।

Saturday, March 29, 2014

रसीदाबानों का जब निकाह हुआ था वह महज 15 साल की थी तथा उनके शोहर की उम्र उस समय 20 के करीब रही होगी। उनके शोहर अकरम अपने सभी 8 भाई बहनों में सबसे छोटे थे। निकाह के बाद से ही उनको अपनी गृहस्थी अलग बसानी पड़ गई थी। उनके शोहर ट्रक चलाते थे जो कि महीनो-महीनों घर से बाहर रहते थे। दो छोटे छोटे बच्चों को अकेले सभालना बहुत मुष्किल होता जा रहा था। वो जब खेत पर भैंसों के लिए चारा पानी का इंतजाम करने जाती तो अपने दोनो बच्चो साथ ले जाती थी।
निकाह के 5 साल बाद रसीदा के अम्मीं अब्बु का इंतकाल हो गया जो कि पीछे 5 साल की करीना को छोड गये थे। इस विपत्ती की घड़ी में रसीदा उस मासूम बच्ची को अपने साथ ले आई। करीना, अपनी आपा के बच्चों का खाने खिलाने का ख्याल रख सकती थी। रसीदा को इससे बहुत सहारा मिला। रसीदा के आंगन में अब तीन बच्चे हंसी किलोल करते फिरते और वह अपनी भैंसो का के चारा-पानी के इंतजाम करने में लगी रहती। रसीदा अपनी भैंसों का दूघ आस पास की काॅलोनी की बंघनीयां जो कि उसके घर से ही ले जाती थी।
रसीदा के दिन रात मेहनत के कारण वह अपनी उम्र से भी ज्यादा लगती थी। एक-आध पुरानी बंधनियों को छोडकर किसी को पता न था कि करीना उसकी छोटी बहन है। और न ही कभी किसी को इस बात का अहसास होने दिया कि करीना उसकी बैटी नही। दष-पांच दिन के लिए उसका पति घर आता तो दिन भर इन बच्चों के साथ घर पर ही रहता। करीना बाकी बच्चों की तरह अकरम को भी अब्बु ही बुलाती थी। अकरम भी इन बच्चों पर जान देता था। जब भी घर आता बच्चों के लिए कुछ न कुछ लेकर जरूर आता था।
कालचक्र कहां रूकता है। रसीदा अब अपने योवन के ढलान पर थी, या यों कहे कि अपनी तरफ ध्यान न देने के कारण 25 की उम्र में वह 40 की लगने लगी थी। करीना अब 15 साल की हो गई, चुन्नी-ओढनी डालकर रहने लगी थी। बच्चों के साथ उछलना कूदना भी कम होता जा रहा था। रसीदा पेट से थी । करीना अपनी आपा का लगभग सारा काम वह खुद संभालने लग गई थी। वह इतनी सुंदर तो न थी पर यौवन उसे दिन-ब-दिन आकर्षक बनाता जा रहा था। हालांकि बचपना अभी पुरी तरह गया नहीं था। घर की चारदीवारी में वह स्वच्छद रहती थी।
इस दौरान रसीदा का पति जो कि इस बार छः सात महीनों के बाद घर आया था। रसीदा ने घर का भारी काम करीना को सौंप दिया था। वह सिर्फ चारा लेने करीना के साथ जाती और बाकी दिन घर में ही बरामदें में खाट पर लेटी रहती। अकरम करीना के काम में हाथ बटाने लगा। करीना ने अकरम के कहने पर उसे जीजा बुलाने लगी। जिस पेड़ की छांव में उसका बचपन बीता उस पेड़ से अपना लगाव वो कैसे भूल सकती थी। पर अब उस पेड़ की छांव दिन ब दिन छितराई-सी होने लगी थी। मानो पतझड़ का मौसम जल्दी आ गया हो।
करीना अब भी बेफिक्र थी। अकरम उसे नित नई चीजें लाकर देने लगा। उसका बालमन इस बात से अनभिज्ञ था कि षिकारी अपना जाल बुन रहा है। औरतो का सिक्स्थ सेंस बहुत विकसित होता है। रसीदा ने अकरम के मंसूबे भांप कर वह ज्यादातर उसके आस पास ही रहती थी। उसको खुद से ज्यादा उसकी फिक्र थी। पर करे क्या? वह इस हालात में नहीं थी कि शोहर को कुछ बोल सके। उसके डिलेवरी का वक्त भी नजदीक था। इन हालात में उसका साथ रहना भी लाजमी था। करे तो क्या करे। यहां तो छींकते ही नाक कटती है।
यह कहानी आपको सामान्य लग रही होगी क्योंकी यह रिष्ता जीजा-साली का पहले ही दकयानूसी विचारों से अभिसिप्त है।
क्या आप को नहीं लगता यह कहानी हमारे आस पास की न जाने कितने ही घरों की है।  पर क्या हो जब यह रिष्ता कुछ और हो? बच्चियों के साथ न जाने कितने ही अपराध होते हैं इस समाज में पर वो करें क्या? लोकलाज के डर से सहमी रहती है।

Monday, March 24, 2014

रविवार दिनांक  23.03.2014
होटल स्वरूप विलास
       केमिस्ट टाइगर मिशन 2017, के बेनर तले अलवर डिस्ट्रिक्ट कैमिस्ट एशोसिऐशन द्वारा आयोजित एजुकेशनल सेमिनार का आयोजन किया गया। सुबह दष बजे अलवर जिले के सभी समाजसेवी केमिस्ट बुद्वीजिवीयों को सशुल्क आमंत्रित किया गया। इस कार्यक्रम का प्रथम सोपान होटल के भव्य परिसर में भगवान इंद्र के आषीर्वाद से सुनियोजित तरीकों से प्रारंम्भ हुआ। इस आयोजन का प्रमुख उद्वेष्य केमिस्टो को षिक्षित करना जिससे कि सिड्युल एच1 भूत का भय समाप्त हो सके।
     प्रवेष द्वार पर लम्बी कतार ने अपने ही अर्थदान से स्वयं का सम्मान करवाया तथा स्वयं की पहचान वह भूल न जाए उनके गलों में एक विषेष परिचय पत्र लटकाया गया। कुछ विषेष आदरणिय मानुभावों की राजाषाही अंदाज में स्वयं ने साफापोषी करवाई (स्वंय के अर्थदान से)। उनका रौब व मिथ्याभिमान यह प्रकट कर रहा था कि समाजसेवी समुदाय में उनका कितना मान है। सुगंधमय वातावरण (अल्पाहार की सुगंध) कतार को लम्बा किए जा रहा था।
       मुख्य अतिथि गणों के आगमन पर अभिवादन स्वरूप अल्पाहार की जंग का ऐलान किया गया। प्रष्ठभूमि में मधुर संगीत लगातार योद्वाओं को प्रेरित कर रहा था। 12 बजे तक सारा समुदाय एक़ित्रत हो चुका था। इतनी भीड़ का अंदाजा शायद आयोजकों को पहले से ही था तो नियोजित तरीके से यहां छटनी करना अनिवार्य हो गया;  इस भय से कि कहीं ज्यादा बुद्विमान समाजसेवी लोग इस समारोह को विफल न कर दें। अतः यह जरूरी हो गया कि जो लोग समाजसेवा के दायित्व को समझते हैं, वे ही ओडिटोरियम में पहुंचे। प्रयोजक महोदय की इस योजना का सकारात्मक परिणाम मिला, जो भोजनभट्ठ थे, वो यहां से ही समाजसेवा के लिए प्रस्थान कर गये।
        यहां से विजित प्रबुद्व लोगों के  काफिले ने मय गाजेबाजे के साथ ओडिटोरियम के लिए प्रस्थान किया। राजकीय समारोह की तर्ज पर काफिला ओडिटोरियम पहुंचा। प्रथम तीन पंक्तियॉं विशिष्ट दरबारियों को लिए आरक्षित रखीं गयी। शेष सीटों पर अपनी-अपनी प्रकृति के  सहसमाजसेवकों के साथ वे लोग विराजे जो इस उम्मीद में आये थे कि यहां पर कुछ शिक्षा प्राप्त कर आधुनिक तरीकों से समाज सेवा कर सके।
         फीता काटा गया जैसे की आज ही इस राजदरबार का प्रथम दिन हो। सभी ने अपने अपने नामित स्थान पर आशन ग्रहण किया। उदघोषिका महोदया ने माइक संभाल कर कार्यक्रम का संचालन बहुत ही रोचकता से प्रारंभ किया। माननीय महाराज का माल्यार्पण कर टोपी पहनाई गई। तलवार भेंट कर हमनें उन्हें अपने कर्तत्व्य पालन करने की याद दिलाई। टोपी पहनाने का क्रम योग्यतानुसार जारी रहा। इस राजदरबार में इस स्थानिक समुदाय के वास्तविक पालक, के थोड़ा लेट आने के आष्वासन उपरांत ज्ञानषाला की शुरूआत की गई। साहब अंर्तयामी हैं! जानते थे, अखिर आप ने काफी समय इस समुदाय की अगुवाई की है, कि इस समुदाय पर इस तरह की ज्ञान शालाओं का क्या प्रभाव होना है?
         सबसे पहले महाराष्ट्र के केमिस्ट समुदाय की काया पलटने वाले तथा फार्मासिस्ट को स्वभिमान जीवनषैली प्रदान करने वाले विषिष्ट अतिथि को बुलाया गया। महाराष्ट्र में आपके अथक प्रयासों से इस प्राणी को पहचान दिलाई यह हमारे लिए एक उम्मीद है। मंच पर हम आपसे यह उम्मीद कर रहे थे कि शायद आप हमारे पक्ष में कुछ बोलेंगे। लेकिन जिस मंच पर आप थे शायद उसकी मर्यादा के ख्याल ने आप को न बोलने दिया हो।
            आपने आधुनिकता के साथ समाजसेवा के इस व्यापार के नवीनीकरण पर बल दिया। शायद आप इस बात से अनभिज्ञ थे कि राजस्थान की कर्मभूमि ने ऐसे ऐसे सपूतों को जन्म दिया है जिन्होंने दुनिया को व्यापार करना सिखाया है। यहां पर 1500 रूपयों के लिए फार्मासिस्ट अपनी आबरू बेच देता है। हमारे यहां फार्मासिस्ट कौनसा प्राणी होता है, इस समाज के अलावा कोई नहीं जानता, तथा इस प्राणी की पहचान को हमेषा गुप्त रखा जाता है। फार्मासिस्ट को इतना विवेकहीन प्राणी बना दिया गया है कि वह शायद ही कभी ये जान पाए की उसकी अहमियत क्या है। उसका मनोबल इतना गिरा दिया गया है कि उसके हाने या न होने से सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ता। दो चार प्रतिभाषाली भाई सरकार में पहुंच भी गये तो उनको भी इन बेचारे प्राणीयों से कोई सरोकार नहीं । यह प्राणी स्वयं ही इसके लिए जिम्मेदार है या कोई और यह एक शोध का विषय हो सकता है। राजस्थान में साफ देखा जा सकता है आधे से ज्यादा फार्मेसी कोलेज खाली पड़े है। कोई गलती से या मजबूरी में फार्मेसी कर भी लेता है तो यहां की सरकार को उसकी कोई जरूरत नहीं। पूंजीपतियों के लिए इसमें बहुत संभावनाएं हैं पर जो पढ़लिख कर अपना भाग्य लिखना चाहता है उसके लिए यहां कोई स्कोप नहीं। यहां की सरकार फार्मेंसी एक्ट की पालना स्वयं नहीं करती पर जनता इसकी अवहेलना नहीं कर सकती।
      तत्पष्चात सरकार के प्रमुख प्रतिनिधी ने इस सिड्यूल की पालना के नैतिक कर्तव्य को समझाया ताकि हमारी भावी पीढी का स्वास्थ्य सुरक्षित रह सके। केमिस्ट समुदाय के समाज में महत्व को याद दिलाया गया। आपने कम शब्दों में ही इस समुदाय को एक नई विचारधारा प्रदान की।
       एक दो प्रभावी ज्ञानोपदेषों के बाद समुदाय से आपत्तियां मांगी गई जिनमें अधिकांषतः झोले छापों के संदर्भ में थी। किसी पिड़ित फार्मासिस्ट ने सरकार के निषुल्क दवा वितरण केंद्रो पर नियुक्ति के संदर्भ में सरकार की मंषा जाननी चाही । जिसका जवाब बहुत व्यंगात्मक शैली में दिया गया। खैर कोई बात नहीं वैसे यह मंच भी उचित नहीं था तो जिस जवाब की आषा थी वही प्राप्त हुआ। एक और रोचक सवाल उदघोषिका महोदया द्वारा पूछा गया जिसका कोई भी व्यवहारिक प्रतिउत्तर प्राप्त न होने से छोभित हो आषुरचित काव्यमय शैली में एक आम आदमी की पीड़ा को उजागर किया।
         काफी समय बाद शायद उनकी अंर्तआत्मा की आवाज पर हमारे फार्मासिस्ट समुदाय के प्रतिनिधी ने फामोसिस्टों के स्वाभिमान को बचाने की चेष्टा की उस समय ऐसा लगा की हमने एक सही फार्मासिस्ट प्रतिनिधि को चुना है जो कि हमें  बेआबरू नहीं होने देगा ।
          इसके उपरांत कुछ विषिष्ट समाजसेवीयों ने अपना सम्मान महाराज द्वारा करवाया।
समारोह के अंत में एक रहस्य से पर्दा उठाया गया कि इस समारोह का एजेंडे तीन थे।
1.    मनोरंजन
2.    मनोरंजन
3.    मनोरंजन
          तीसरा एजेंडा रात्रि  को सम्पन्न हुआ जो कि कैमिस्ट समुदाय के समाजिक दायित्व पर प्रष्न चिन्ह था। भोजनोपरांत अभद्र  नृत्य प्रोग्राम का के इस आयोजन पर भगवान इंद्र को भी इतना क्षोभ हुआ की उन्हें मजबूर होकर अपना प्रकोप दिखाना पडा।

Saturday, March 22, 2014

होली का महत्व

होली ने जो अंर्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की है वह कोई अन्य पर्व हासिल न कर सका है। भिन्न-भिन्न देषो में अपने-अपने रीति रिवाजों के अनुसार मनाया जाने वाला यह पर्व, चाहे किसी भी नाम से मनाया जाता हो पर इसकी मूल आत्मा उसी इष्वर की भांति है जिसका मकसद एक ही है मानवता की रक्षा। मानवीय मुल्य यथा प्रेम, सोहार्द, भाइचारा, समानता आदि गुणों का पोषण इस पर्व को अजर व अमर बना रहा है।

विषेषकर भारत में जहां सामाजिक समानता के लिए किये गये विषेष प्रावधानों के बावजूद अपने लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पा रहा है। यदि सरकार इस पर्व को नियोजित रूप से मनाए तो उसके सभी लक्ष्य अविलम्ब पूर्ण हो सकते है। हालांकि सरकार ने इस पर्व हेतू साधनों की उपलब्धता सुनिष्चित कर रखी है चाहे वो राजकीय कोष में अभिवृद्वि के लिए ही क्यों न हो पर उसे इस बात का अंदाजा भी नहीं है कि ये साधन उसके किसी अन्य उद्वेष्य के पूरक साधन सिद्व हो रहे है।

हालांकि सिक्के के सदा दो पहलु रहते आएं है लेकिन मेरी दृष्टि फिलहाल जो प्रत्यक्ष है उसी पर टिकी हुई है। होली वैसे तो प्राचीन काल से हर्षोल्लास से मनाया जाता है। भगवान शंकर के प्रसाद के अलौकिक आनंद ने इस पर्व को हर काल में अपनी उत्तरोत्तर पीढ़यों को सौंपा है । कहते है परिवर्तन श्रृष्टि का नियम है उसी के अनुरूप देष व काल के अनुसार परिवर्तन स्वत ही परिलक्षित होते है।

भगवान षिव के प्रसाद की जगह अब आधुनिक नषे ने जब से ली है समाज में अप्रत्याषित परिवर्तन हो रहे है। जो आन्दोलनों से न हो सका वो कुछ दषकों में मदिरा ने कर दिखाया है। होली पर्व अब पुरातन परम्परा का मात्र रेखा चित्र बन कर रह गया है। कुछ पुरातन पंथियों को छोडकर ज्यादातर यह पर्व विषेषकर आधुनिक युवा पीढी (21वीं सदी की वर्जन) अपने ही अंदाज में मनाता है। इस दिन मदिरालय विषेष रूप से सज्जित किये जाते है। होली भक्तों को कोई असुविधा न हो इसके ज्यादा से ज्यादा प्रबंध किये जाते है। पुलिस व प्रषासन इस दिन विषेष तौर से पाबंद किये जाते हैं ताकि भक्तों को कोई तकलीफ न हो। अगर चुनाव नजदीक हों तो राजनैतिक रंग इस पर्व को चिरकाल तक स्मरणीय बना सकता है। होली का यह पर्व, होलिका दहन वाले दिन इतने उल्लास व उमंग से नहीं मनाया जाता जितना की उसके दूसरे दिन। दुलहंडी, शायद आधुनिक पीढी इसी दिन को होली का मुख्य दिवस समझती है।

यह पर्व सुबह दष बजे से सुरू होता है, आज समझ गये! इससे लगता है कि मेरा इषारा सही था। मदिरालय के पट खुलते ही होली अपने बचपन से किषोरवस्था से हाती हुई योवन काल में 12 बजे तक पहुंच जाती है। इसके बाद शुरू होता है सामाजिक सदभाव के इस पर्व का वास्तविक चित्रण।