रसीदाबानों का जब निकाह हुआ था वह महज 15 साल की थी तथा उनके शोहर की उम्र उस समय 20 के करीब रही होगी। उनके शोहर अकरम अपने सभी 8 भाई बहनों में सबसे छोटे थे। निकाह के बाद से ही उनको अपनी गृहस्थी अलग बसानी पड़ गई थी। उनके शोहर ट्रक चलाते थे जो कि महीनो-महीनों घर से बाहर रहते थे। दो छोटे छोटे बच्चों को अकेले सभालना बहुत मुष्किल होता जा रहा था। वो जब खेत पर भैंसों के लिए चारा पानी का इंतजाम करने जाती तो अपने दोनो बच्चो साथ ले जाती थी।
निकाह के 5 साल बाद रसीदा के अम्मीं अब्बु का इंतकाल हो गया जो कि पीछे 5 साल की करीना को छोड गये थे। इस विपत्ती की घड़ी में रसीदा उस मासूम बच्ची को अपने साथ ले आई। करीना, अपनी आपा के बच्चों का खाने खिलाने का ख्याल रख सकती थी। रसीदा को इससे बहुत सहारा मिला। रसीदा के आंगन में अब तीन बच्चे हंसी किलोल करते फिरते और वह अपनी भैंसो का के चारा-पानी के इंतजाम करने में लगी रहती। रसीदा अपनी भैंसों का दूघ आस पास की काॅलोनी की बंघनीयां जो कि उसके घर से ही ले जाती थी।
रसीदा के दिन रात मेहनत के कारण वह अपनी उम्र से भी ज्यादा लगती थी। एक-आध पुरानी बंधनियों को छोडकर किसी को पता न था कि करीना उसकी छोटी बहन है। और न ही कभी किसी को इस बात का अहसास होने दिया कि करीना उसकी बैटी नही। दष-पांच दिन के लिए उसका पति घर आता तो दिन भर इन बच्चों के साथ घर पर ही रहता। करीना बाकी बच्चों की तरह अकरम को भी अब्बु ही बुलाती थी। अकरम भी इन बच्चों पर जान देता था। जब भी घर आता बच्चों के लिए कुछ न कुछ लेकर जरूर आता था।
कालचक्र कहां रूकता है। रसीदा अब अपने योवन के ढलान पर थी, या यों कहे कि अपनी तरफ ध्यान न देने के कारण 25 की उम्र में वह 40 की लगने लगी थी। करीना अब 15 साल की हो गई, चुन्नी-ओढनी डालकर रहने लगी थी। बच्चों के साथ उछलना कूदना भी कम होता जा रहा था। रसीदा पेट से थी । करीना अपनी आपा का लगभग सारा काम वह खुद संभालने लग गई थी। वह इतनी सुंदर तो न थी पर यौवन उसे दिन-ब-दिन आकर्षक बनाता जा रहा था। हालांकि बचपना अभी पुरी तरह गया नहीं था। घर की चारदीवारी में वह स्वच्छद रहती थी।
इस दौरान रसीदा का पति जो कि इस बार छः सात महीनों के बाद घर आया था। रसीदा ने घर का भारी काम करीना को सौंप दिया था। वह सिर्फ चारा लेने करीना के साथ जाती और बाकी दिन घर में ही बरामदें में खाट पर लेटी रहती। अकरम करीना के काम में हाथ बटाने लगा। करीना ने अकरम के कहने पर उसे जीजा बुलाने लगी। जिस पेड़ की छांव में उसका बचपन बीता उस पेड़ से अपना लगाव वो कैसे भूल सकती थी। पर अब उस पेड़ की छांव दिन ब दिन छितराई-सी होने लगी थी। मानो पतझड़ का मौसम जल्दी आ गया हो।
करीना अब भी बेफिक्र थी। अकरम उसे नित नई चीजें लाकर देने लगा। उसका बालमन इस बात से अनभिज्ञ था कि षिकारी अपना जाल बुन रहा है। औरतो का सिक्स्थ सेंस बहुत विकसित होता है। रसीदा ने अकरम के मंसूबे भांप कर वह ज्यादातर उसके आस पास ही रहती थी। उसको खुद से ज्यादा उसकी फिक्र थी। पर करे क्या? वह इस हालात में नहीं थी कि शोहर को कुछ बोल सके। उसके डिलेवरी का वक्त भी नजदीक था। इन हालात में उसका साथ रहना भी लाजमी था। करे तो क्या करे। यहां तो छींकते ही नाक कटती है।
यह कहानी आपको सामान्य लग रही होगी क्योंकी यह रिष्ता जीजा-साली का पहले ही दकयानूसी विचारों से अभिसिप्त है।
क्या आप को नहीं लगता यह कहानी हमारे आस पास की न जाने कितने ही घरों की है। पर क्या हो जब यह रिष्ता कुछ और हो? बच्चियों के साथ न जाने कितने ही अपराध होते हैं इस समाज में पर वो करें क्या? लोकलाज के डर से सहमी रहती है।
निकाह के 5 साल बाद रसीदा के अम्मीं अब्बु का इंतकाल हो गया जो कि पीछे 5 साल की करीना को छोड गये थे। इस विपत्ती की घड़ी में रसीदा उस मासूम बच्ची को अपने साथ ले आई। करीना, अपनी आपा के बच्चों का खाने खिलाने का ख्याल रख सकती थी। रसीदा को इससे बहुत सहारा मिला। रसीदा के आंगन में अब तीन बच्चे हंसी किलोल करते फिरते और वह अपनी भैंसो का के चारा-पानी के इंतजाम करने में लगी रहती। रसीदा अपनी भैंसों का दूघ आस पास की काॅलोनी की बंघनीयां जो कि उसके घर से ही ले जाती थी।
रसीदा के दिन रात मेहनत के कारण वह अपनी उम्र से भी ज्यादा लगती थी। एक-आध पुरानी बंधनियों को छोडकर किसी को पता न था कि करीना उसकी छोटी बहन है। और न ही कभी किसी को इस बात का अहसास होने दिया कि करीना उसकी बैटी नही। दष-पांच दिन के लिए उसका पति घर आता तो दिन भर इन बच्चों के साथ घर पर ही रहता। करीना बाकी बच्चों की तरह अकरम को भी अब्बु ही बुलाती थी। अकरम भी इन बच्चों पर जान देता था। जब भी घर आता बच्चों के लिए कुछ न कुछ लेकर जरूर आता था।
कालचक्र कहां रूकता है। रसीदा अब अपने योवन के ढलान पर थी, या यों कहे कि अपनी तरफ ध्यान न देने के कारण 25 की उम्र में वह 40 की लगने लगी थी। करीना अब 15 साल की हो गई, चुन्नी-ओढनी डालकर रहने लगी थी। बच्चों के साथ उछलना कूदना भी कम होता जा रहा था। रसीदा पेट से थी । करीना अपनी आपा का लगभग सारा काम वह खुद संभालने लग गई थी। वह इतनी सुंदर तो न थी पर यौवन उसे दिन-ब-दिन आकर्षक बनाता जा रहा था। हालांकि बचपना अभी पुरी तरह गया नहीं था। घर की चारदीवारी में वह स्वच्छद रहती थी।
इस दौरान रसीदा का पति जो कि इस बार छः सात महीनों के बाद घर आया था। रसीदा ने घर का भारी काम करीना को सौंप दिया था। वह सिर्फ चारा लेने करीना के साथ जाती और बाकी दिन घर में ही बरामदें में खाट पर लेटी रहती। अकरम करीना के काम में हाथ बटाने लगा। करीना ने अकरम के कहने पर उसे जीजा बुलाने लगी। जिस पेड़ की छांव में उसका बचपन बीता उस पेड़ से अपना लगाव वो कैसे भूल सकती थी। पर अब उस पेड़ की छांव दिन ब दिन छितराई-सी होने लगी थी। मानो पतझड़ का मौसम जल्दी आ गया हो।
करीना अब भी बेफिक्र थी। अकरम उसे नित नई चीजें लाकर देने लगा। उसका बालमन इस बात से अनभिज्ञ था कि षिकारी अपना जाल बुन रहा है। औरतो का सिक्स्थ सेंस बहुत विकसित होता है। रसीदा ने अकरम के मंसूबे भांप कर वह ज्यादातर उसके आस पास ही रहती थी। उसको खुद से ज्यादा उसकी फिक्र थी। पर करे क्या? वह इस हालात में नहीं थी कि शोहर को कुछ बोल सके। उसके डिलेवरी का वक्त भी नजदीक था। इन हालात में उसका साथ रहना भी लाजमी था। करे तो क्या करे। यहां तो छींकते ही नाक कटती है।
यह कहानी आपको सामान्य लग रही होगी क्योंकी यह रिष्ता जीजा-साली का पहले ही दकयानूसी विचारों से अभिसिप्त है।
क्या आप को नहीं लगता यह कहानी हमारे आस पास की न जाने कितने ही घरों की है। पर क्या हो जब यह रिष्ता कुछ और हो? बच्चियों के साथ न जाने कितने ही अपराध होते हैं इस समाज में पर वो करें क्या? लोकलाज के डर से सहमी रहती है।
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