होली का महत्व
होली ने जो अंर्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की है वह कोई अन्य पर्व हासिल न कर सका है। भिन्न-भिन्न देषो में अपने-अपने रीति रिवाजों के अनुसार मनाया जाने वाला यह पर्व, चाहे किसी भी नाम से मनाया जाता हो पर इसकी मूल आत्मा उसी इष्वर की भांति है जिसका मकसद एक ही है मानवता की रक्षा। मानवीय मुल्य यथा प्रेम, सोहार्द, भाइचारा, समानता आदि गुणों का पोषण इस पर्व को अजर व अमर बना रहा है।
विषेषकर भारत में जहां सामाजिक समानता के लिए किये गये विषेष प्रावधानों के बावजूद अपने लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पा रहा है। यदि सरकार इस पर्व को नियोजित रूप से मनाए तो उसके सभी लक्ष्य अविलम्ब पूर्ण हो सकते है। हालांकि सरकार ने इस पर्व हेतू साधनों की उपलब्धता सुनिष्चित कर रखी है चाहे वो राजकीय कोष में अभिवृद्वि के लिए ही क्यों न हो पर उसे इस बात का अंदाजा भी नहीं है कि ये साधन उसके किसी अन्य उद्वेष्य के पूरक साधन सिद्व हो रहे है।
हालांकि सिक्के के सदा दो पहलु रहते आएं है लेकिन मेरी दृष्टि फिलहाल जो प्रत्यक्ष है उसी पर टिकी हुई है। होली वैसे तो प्राचीन काल से हर्षोल्लास से मनाया जाता है। भगवान शंकर के प्रसाद के अलौकिक आनंद ने इस पर्व को हर काल में अपनी उत्तरोत्तर पीढ़यों को सौंपा है । कहते है परिवर्तन श्रृष्टि का नियम है उसी के अनुरूप देष व काल के अनुसार परिवर्तन स्वत ही परिलक्षित होते है।
भगवान षिव के प्रसाद की जगह अब आधुनिक नषे ने जब से ली है समाज में अप्रत्याषित परिवर्तन हो रहे है। जो आन्दोलनों से न हो सका वो कुछ दषकों में मदिरा ने कर दिखाया है। होली पर्व अब पुरातन परम्परा का मात्र रेखा चित्र बन कर रह गया है। कुछ पुरातन पंथियों को छोडकर ज्यादातर यह पर्व विषेषकर आधुनिक युवा पीढी (21वीं सदी की वर्जन) अपने ही अंदाज में मनाता है। इस दिन मदिरालय विषेष रूप से सज्जित किये जाते है। होली भक्तों को कोई असुविधा न हो इसके ज्यादा से ज्यादा प्रबंध किये जाते है। पुलिस व प्रषासन इस दिन विषेष तौर से पाबंद किये जाते हैं ताकि भक्तों को कोई तकलीफ न हो। अगर चुनाव नजदीक हों तो राजनैतिक रंग इस पर्व को चिरकाल तक स्मरणीय बना सकता है। होली का यह पर्व, होलिका दहन वाले दिन इतने उल्लास व उमंग से नहीं मनाया जाता जितना की उसके दूसरे दिन। दुलहंडी, शायद आधुनिक पीढी इसी दिन को होली का मुख्य दिवस समझती है।
यह पर्व सुबह दष बजे से सुरू होता है, आज समझ गये! इससे लगता है कि मेरा इषारा सही था। मदिरालय के पट खुलते ही होली अपने बचपन से किषोरवस्था से हाती हुई योवन काल में 12 बजे तक पहुंच जाती है। इसके बाद शुरू होता है सामाजिक सदभाव के इस पर्व का वास्तविक चित्रण।
होली ने जो अंर्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की है वह कोई अन्य पर्व हासिल न कर सका है। भिन्न-भिन्न देषो में अपने-अपने रीति रिवाजों के अनुसार मनाया जाने वाला यह पर्व, चाहे किसी भी नाम से मनाया जाता हो पर इसकी मूल आत्मा उसी इष्वर की भांति है जिसका मकसद एक ही है मानवता की रक्षा। मानवीय मुल्य यथा प्रेम, सोहार्द, भाइचारा, समानता आदि गुणों का पोषण इस पर्व को अजर व अमर बना रहा है।
विषेषकर भारत में जहां सामाजिक समानता के लिए किये गये विषेष प्रावधानों के बावजूद अपने लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पा रहा है। यदि सरकार इस पर्व को नियोजित रूप से मनाए तो उसके सभी लक्ष्य अविलम्ब पूर्ण हो सकते है। हालांकि सरकार ने इस पर्व हेतू साधनों की उपलब्धता सुनिष्चित कर रखी है चाहे वो राजकीय कोष में अभिवृद्वि के लिए ही क्यों न हो पर उसे इस बात का अंदाजा भी नहीं है कि ये साधन उसके किसी अन्य उद्वेष्य के पूरक साधन सिद्व हो रहे है।
हालांकि सिक्के के सदा दो पहलु रहते आएं है लेकिन मेरी दृष्टि फिलहाल जो प्रत्यक्ष है उसी पर टिकी हुई है। होली वैसे तो प्राचीन काल से हर्षोल्लास से मनाया जाता है। भगवान शंकर के प्रसाद के अलौकिक आनंद ने इस पर्व को हर काल में अपनी उत्तरोत्तर पीढ़यों को सौंपा है । कहते है परिवर्तन श्रृष्टि का नियम है उसी के अनुरूप देष व काल के अनुसार परिवर्तन स्वत ही परिलक्षित होते है।
भगवान षिव के प्रसाद की जगह अब आधुनिक नषे ने जब से ली है समाज में अप्रत्याषित परिवर्तन हो रहे है। जो आन्दोलनों से न हो सका वो कुछ दषकों में मदिरा ने कर दिखाया है। होली पर्व अब पुरातन परम्परा का मात्र रेखा चित्र बन कर रह गया है। कुछ पुरातन पंथियों को छोडकर ज्यादातर यह पर्व विषेषकर आधुनिक युवा पीढी (21वीं सदी की वर्जन) अपने ही अंदाज में मनाता है। इस दिन मदिरालय विषेष रूप से सज्जित किये जाते है। होली भक्तों को कोई असुविधा न हो इसके ज्यादा से ज्यादा प्रबंध किये जाते है। पुलिस व प्रषासन इस दिन विषेष तौर से पाबंद किये जाते हैं ताकि भक्तों को कोई तकलीफ न हो। अगर चुनाव नजदीक हों तो राजनैतिक रंग इस पर्व को चिरकाल तक स्मरणीय बना सकता है। होली का यह पर्व, होलिका दहन वाले दिन इतने उल्लास व उमंग से नहीं मनाया जाता जितना की उसके दूसरे दिन। दुलहंडी, शायद आधुनिक पीढी इसी दिन को होली का मुख्य दिवस समझती है।
यह पर्व सुबह दष बजे से सुरू होता है, आज समझ गये! इससे लगता है कि मेरा इषारा सही था। मदिरालय के पट खुलते ही होली अपने बचपन से किषोरवस्था से हाती हुई योवन काल में 12 बजे तक पहुंच जाती है। इसके बाद शुरू होता है सामाजिक सदभाव के इस पर्व का वास्तविक चित्रण।
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