हे ईश्वर मैं उस हर नियामत के लिए तेरा शुक्रगुजार हूँ जो तूने मुझे अता कि हैं

मेरे लिए सत्य यह है इस वक्त आप इसे पढ़ रहे हैं.......... धन्यवाद धन्यवाद धन्यवाद

Friday, February 28, 2014

गीता में भी सांख्य दर्शन के त्रिगुणात्मक सिद्धांत को बड़ी सुंदर रीति से अपनाया गया है। "त्रिगुणात्मिका प्रकृति नित्य परिणामिनी है। उसके तीनों गुण ही सदा कुछ न कुछ परिणाम उत्पन्न करते रहते हैं, पुरुष अकर्ता है" -सांख्य का यह सिद्धांत गीता के निष्काम कर्मयोग का आवश्यक अंग बन गया है

Sunday, February 23, 2014

 अपने बच्चे के रोने की आवाज से विचलित बार-बार धूप देखकर दोपहर की छुट्टी होने का इंतजार कर ही रही थी की मालिक का टिफिन लेकर एक मजदूर आया।
मालिक ने उसे डांटते हुए कहा- ’इतनी देर कैसे लगा दी मै भूख से मरा जा रहा था, मैने तो होटल से खाना मंगवा कर खा लिया।’
मजदूर बोला-’मालिक इस टिफिन का क्या करूं? मालिक ने उसे एक कोने में कुत्तों के खाने के लिए छोड़ने का हुक्म देकर आराम करने चला गया।
दोपहर की छुटट्ी में वो अपने बच्चे को दूध पिलाती हुई कपड़े में लिपटी रोटी निकाल कर कोने में पडे महकते भोजन की खुषबु से व्याकुल होकर न जाने क्या सोचकर रोटी को खाने लगी।
क्या सोचा होगा उसने?
मैं एक अमीर घर में पैदा हुई होती या ़़़़़़़़़.............।

Friday, February 21, 2014

मैं जूती........

सभी ने मुझे  उपयोग किया
सभी ने मेरा उपभोग किया,
मैं सदा निर्विरोध, निःप्रष्न।

कभी नहीं कहा मैने,
मेरा काम वो नहीं
हर रूप मैं तेरा साथ दिया।

मुझ से न पूछा कभी किसी ने,
तु क्या चाहती है?
क्या नहीं है मेरे पास
फिर भी क्यों अछूती मैं

क्या नहीं किया मैंने,
कहां साथ नहीं दिया मैंने।
राज से लेकर हर काज का साधन बनी में,
क्यों भूल गये तुम?
बारह साल मेंने भी वियोग सहा,
मैं भी राजरानी रही हॅू
सतयुग में मेरा भी मान था,

क्यों भूल गये तुम?

समय ने थोडा बदला जरूर है,
मेरा नाम व रूप जरूर संवारा है,
तेरी पहचान मु-हजयसे जरूर होने लगी है,

पर मेरा काम भी तो बढ़ा दिया
मैं तो अपने निमित्त काज से खुश  हॅू,
फिर क्यों कराते हो मुझसे वो सब,

जिससे मुझ  अपयश  सहना पडता हे,
मेरे मालिक! तेरा यश  भी तो इसमें नहीं।

Tuesday, February 18, 2014

 कमरे में गूंजते संगीत ने एक दम माहोल को और भी गमगीन बना दिया, मैने तुरंत वोल्यूम को कम कर दिया और मोहित के आने का इंतजार करने लगा।
मोहित ने कमरे में प्रवेश करते ही समझ लिया था कि जिस राज को मैने सभी से छुपा कर रखा था आज खुलने जा रहा है।
उसने पानी का गिलाश आगे किया, मैने गिलाश पकड़ते हुए उसके चेहरे को गौर से देखने लगा। गालों पर आंशूओं की लकीरें साफ दिखाई दे रही थी। पलकें भी सूख चुकि थी। उसे अपने पास बिठाया तथा उसे सान्त्वना देते हुए कुछ साहस देने का प्रयत्न किया ताकि वह कुछ बोल सके।
मैने पूछा- नाम क्या है?
वह दबे हुए स्वर में बोला- नीशा.....
उसके नाम लेने के साथ उसकी नजर एक नीली डायरी पर पडी........ एक हाथ से लपकते हुए वह डायरी मेरी तरफ कर दी।
डायरी के ऊपर लाल स्केच पैर से बड़ी खुबशुरती से लिखा हुआ था, जिसे लिखने में काफी समय लगा होगा, ’नीशा’
क्या है इसमें, मैने पूछा।
मेरी प्रेम कहानी..........
डायरी का पहला पृष्ठ.......... दिनांक 4 फरवरी
4 फरवरी देख मैने पूछा- अभी जो कुछ दिन पहले गई है वह वाली?
नहीं, यह नहीं पिछले साल वाली, 2013
डायरी का साइज देखकर दीवार पर टंगी घड़ी पर नजर पड़ी..... शाम के 6ः14 हो रहे थे। एक बार तो सोचा इसे साथ ले जाता हॅू पर यह सोच कर रह गया कि यह फिर अकेला न जाने क्या कर बैठे।
उसकी लिखावट इतनी स्पष्ट थी की प
यहां से शुरू होती है यह प्रेम कहानी...............

04 फरवरी 2013


   सुबह से ही मौसम खुषनुमा हो रहा था, अभी थोड़ी देर पहले ही बारिष की बौछारों में पेडों ने स्नान किया था शायद ये किसी उत्सव की तैयारी में प्रफ्फुलित हो रहें थै। हवा जरूर मंद  थी लेकिन कभी कभी बगिचे की तरफ से -हवा का झोंका आता तो मानो ऐसा लगता कि कोई इत्र का छिडकाव कर रहा हो। सुन्दर पुष्पलताएं भी स्वागतातुर हो रहीं थीं। जैसे ही कोलेज के मैन गेट से पैदल-ंपैदल आगे ब

    दश बजते ही पुरा कोलेज कैंपस भर सा गया, एक तरफ लेडिज स्टाफ अधिकांशतः पीले वस्त्रों में था तो लड़कियां भी बिना कोई पूर्व उदघोषणा के पीले परिधानों में नजर आ रही थी, आज पूर्व और पश्चिम संस्कृतियां गले मिल रही थी। पीले आधूनिक परिधानों का अद्भुत मेल था। सभी लड़के लडकियाॅं कान्फ्रेस हाॅल में एकत्रित होने लगे थे। बांयी तरफ लड़कियों ने कब्जा जमा लिया था तो दूसरी तरफ लड़के अपने-अपने गु्रपों में व्यवस्थित होने लग गये थै। मैं भी अपने एक मित्र के साथ आगे से दूसरी पंक्ति में व्यवस्थित हो गया। सभी लड़को की नजर बांई और निर्निमेष अपना पोषण प्राप्त कर रहीं थी। लगभग सभी समुहों में अधिकांशतः वार्तालाप कुछ ही शब्दों में सारांशित थी जैसे मस्त, हैयर स्टाइल, आंखें, फिगर, मजा आ जाए, तेरी वाली, मेरी वाली,

Monday, February 17, 2014

my Starting......



मैने निजि अनुभवों को कलमबद्व किया है जो शायद आपको पसन्द आयें या न आयें एक जागरूक पाठक से में आलोचना या सराहना की अपेक्षा रखता हॅूं।

18 फरवरी 2014 दोपहर 2-00

खाली समय में अक्सर में यू टयूब पर कुछ कुछ सर्च कर लिया करता था।  उस दिन भी वही कर रहा था।  किसी कोमेडी मुवी का कोई अंश को देखकर मु-हजये अपने एक मित्र की याद आ गई। वो शख्स इतना हॅसमुख है कि एक बार तो उसकी शक्ल देखकर ही हॅसी आ जाती है।

काफी दिनों से उसे देखा नहीं था सो मन में विचार आ कर अटक सा गया था। काफी सोचने के बाद भी कोई कारण नजर नहीं आया तो उसे फोन लगा कर पूछा कि क्या बात है आजकल दिखाई नहीं देते।

उसकी आवाज सुनकर कुछ अजीब सा महसूस हुआ

विकास ने कहा- कुछ नहीं बस ऐसे ही कहकर मौन हो गया........उसकी लम्बी सांस की आवाज फोन से होकर मेरे कानों में वेदना सी बनकर टकराई...... 

कुछ पल बाद उसने  पूछा, -ंउचय ’कैसे याद किया, भैया, कोई काम हो तो बताओ, उसने ज्यादा बात न करने के अन्दाज में जवाब दिया। उसकी आवाज साफ-ंउचयंसाफ बयॉं कर रही थी कि वह किसी घोर संकट में है और जैसे किसी मजबूरी में मु-हजयसे बात कर रहा हो।

मैंने पूछा-ंउचय तबीयत तो ठीक है न? क्या बात है कुछ तो बता? कुछ नहीं भैया, इतना कहते ही उसकी आवाज लड़खडा़ गई ओर फोन रख दिया।

मैं एक अजीब सी फिलिंग महसूस कर रहा था जो कि काफी समय पश्चात मेरे दिल पर हल्का सा भार लिए महसूस हो रही थी। फिर मन में ख्याल आया कि कहीं प्यार-ंउचयंव्यार का चक्कर तो नहीं, फिर दूसरा विचार आया कि मोहित तो सीधा साधा लडका है कहां इन शहरी लडकियों के चक्कर में आ सकता है।

क्या? ऐसा हो भी सकता है कोई बड़ी बात तो है नहीं, लडका स्मार्ट है, स्पोर्टमैन-ंउचयसा लगता है, खास बात यह है कि वो हॅंसमुख है। मैने चिंतावश उसे दोबारा फोन लगाया लेकिन वह स्विच आफ आ रहा था।

पुनः विचारों की लडी़ बनना शुरू हो गई, बात क्या हो सकती है? उसे कभी इतना गंभीर तो कभी नही देखा। कुछ तो बात है? मन में कुछ घबराहट भी होने लगी थी, अनेको कल्पित दृश्य ख्यालों में विचरण करने लगे। विचारों का क्रम लगभग 2 घंटे तक चला । उस समय शाम के 5 बजे होंगे। अपनी बाईक उठाई और उसके कमरे की तरफ चल पडा।


मैं लगभग दश मिनट में उसके रूम पर पहुंचा। दरवाजा बंद था, तीन चार बार नोक करने पर भी कोई प्रतिउत्तर नहीं मिला तो अब चिंता का ब-सजय़ गई! मकान मालकिन भी आवाज सुनकर बाहर आ गई। आंटी ने दरवाजे को खटखटाने के साथ आवाज लगाई, इस बार दरवाजा खोला तो अपने कानोे से लीड हटाते हुए बोला -ंउचयंहां, आंटी, ओर फिर उसकी दृष्टि मु-हजय पर पड़ी, थोडा सकुचाते हुए बोला ’भैया आप! इस समय! आंटी बीच में ही बात काटते हुए बोली ’पिछले दश मिनट से पुकार रहे थे। मोहित कुछ न बोला मु-हजये अंदर बुला कर बेतकल्लुफी से दरवाजा बंद कर दिया।

कुछ देर मौन रहने के पश्चात हल्की सी बनावटी मुस्कान से बोला-ंउचय मैं गाने सुन रहा था सो आवाज नहीं आई। वह मोबाइल बिस्तर पर पटक कर पानी लेने गया, उसकी गैरहाजिरी में मैंने उसका मोबाइल उठा लिया जिस में अभी भी लीड लगी हुई थी तथा कोई गाना अभी भी चल रहा था, जैसे ही मैंने लीड हटायी पूरे कमरे में गाना गूंज उठा,  ’अच्छा सिला दिया तुने मैरे प्यार का’

http://www.youtube.com/watch?v=nBtPj_kWkY8