संवेदनहीनता
सामने बनती बहुमंज़िला इमारत
मैं देखता हर रोज़ वही क्रम
सेकड़ो मज़दूर लग जाते
मशीन की तरह अपने तन से
बिना भय के चढ़ जाते
बल्लियों पर
जान की परवाह किसे
मन में है सिर्फ दिहाड़ी i
कोई हादसा होता
दौड़ पड़ते सभी साथी
सँभालने को
मैनेजर दौड़ता हांफता सा
खोजता हाज़िरी रजिस्टर
में नाम पीड़ित का
मिटा देता नामोनिशान उस पाने का
घायल मजदूर बेनाम पहुंचा दिया जाता
खैराती दवाखाने...
ओ पी सुमन
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