मैं अचल, पर जड़ नहीं
संवेदनायें गतिशील मुझमे
क्या नहीं देता तुम्हे
अपना सीना चीर
सोना, चाँदी, हीरे
भौतिक से अध्यात्म
सब कुछ दिया तुम्हे
जीवन रेखा
मेरे ह्रदय से निकल
सींचती तुम्हे
मेघ आलिंगन से
हर्षित ह्रदय तर करता तुम्हे
मेरी ऊर्जा बहती है तुझमे
संवेदना बन पलती है तुझमे
मैं अचल हूँ पर अजर अमर नहीं
जीवन ज्योति नित घटती
मेरा श्रंगार लूटते तुम
वस्त्रहीन करने पर तुले तुम
कब तक सहूँ, मैं अचल
वेदना सहने को मजबूर
कैसे प्रकट करूँ अपनी वेदना
तुमने तो भौतिकवादी अभेद्य
आवरण ओढ़ लिया
अंदर अँधेरा कर लिया
याद है केदारनाथ
जब मैं फूटकर रोया था
पर तुम्हे मेरे आँशु नहीं दिखते
अब भी लगे हो काटने मुझे
छोड़ते हो जहरीला धुँआ
दम घुटने लगा है मेरा
कब तक सहूँ वेदना
अब डर लगता है
कहीं रो न पडूँ मैं
opsuman
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