हे ईश्वर मैं उस हर नियामत के लिए तेरा शुक्रगुजार हूँ जो तूने मुझे अता कि हैं

मेरे लिए सत्य यह है इस वक्त आप इसे पढ़ रहे हैं.......... धन्यवाद धन्यवाद धन्यवाद

Monday, April 7, 2014


आज सुबह जैसे ही फेसबुक खोला पहली पोस्ट देखकर चैंक गया, फिर भगवान का शुक्रिया अदा किया कि मैं तो बच गया क्योंकि  मैने तो अभी तक सोचा ही नहीं कि किसे अपना वोट देना है। फिर उस विज्ञापन पर गौर किया कि यह किस सभ्यता के तत्व की उपज है? मनुष्य हैं तो सोचना भी जरूरी हो गया कि आखिर गधा कहा किसे है व इसके पीछे इसका क्या उद्वेष्य सकता है? कहीं यह राजनैतिक पैंतरा तो नहीं? पर क्या कोई किसी को गधा बता कर वोट ले सकता है? सोचते सोचते दिमाग का दही हो गया पर यह निश्कर्ष नही निकला कि गधा कोन है। पर यह बात तो साफ है कि बिना किसी कारण से तो यह पोस्ट नहीं किया गया। इतने सारे लाइक और शेयर किये गये है तो कुछ न कुछ तो होगा इसमें। फिर दुसरे एंगल पर गौर किया कहीं यह कोई कलाकृति तो नहीं है जो इतने लाइक मिले है फिर गौर से एक एक पिक्सल को देखा और नजरें उसकी नजरों से मिल कर अटक गई। कितनी गहराई है इन आंखों में अगर ऐसी आॅंखो वाली कोई युवती होती तो लाजमी है कि लाइक का ग्राफ अप्रत्याशित होता। मन को एक पल को तसल्ली हुई कि आंखो कि वजह से इसे लाइक किया जा रहा है, पर यह विचार ज्यादा देर तक नहीं टिक पाया। फिर सोचा कि शब्दों पर गौर किया जाए शायद कुछ मिल जायै। एक एक शब्द का विश्लेषण करने लगा, सभी विषयों के मिश्रित ज्ञान ने और ही ज्यादा कनफ्यूज कर दिया। कभी दर्शनशास्त्र तो कभी राजनैतिक विज्ञान । जुलोजी भी कम नहीं उलझा रही थी। जुलोजी का कथन था कि यह मैरी मार्डन ब्रांच बायोटेक्नोलोजी का उत्पाद है इसमें जनेटिक्स का बहुत उपयोग किया गया है। इंसानी आंखे, खरगोश के दांत, गधे सा चेहरा । हंसी तो दर्शनशास्त्र का कार्यक्षेत्र प्रतीत होता है। दर्शन तो इतना तार्किक है कि अगर लिखने बैठे तो एक किताब छप जाये। और राजनीति कहती है कि जंग और प्यार में सब जायज है। इंसान को कब गधा कहना है कब इंसान मानना है यह इसका प्रमुख अस्त्र भी है और शस्त्र भी। राजनीति यह भी कहती है कि गरज पडने पर तो गधे को भी बाप बना लेना चाहिए। इस विचार ने तो मुझे दिग्भ्रमित कर दिया। अब ये बाप कौन है? और यह गधा कौन है?
वैसे सभी राजनैतिक पार्टियों के एजेडे आने वाले है अगर हम अपने आप को विवेकशील प्राणी मानते है तो एक बार वोट देने से पहले एजेडे को अवश्च पढ़े  और जो ज्यादा हकीकत के करीब हो उसे अपना अमुल्य वोट दें। वैसे हर व्यक्ति की अपनी सोच व दायरा होता है उसी के अनुरूप उसका चिंतन व चेतना उसके विचारो का पोषण करती है।
             एक बात काफी दिनों से मुझे परेशान कर रही थी कि चुनावी माहौल में उसकी जीत होती है जिसका प्रचार ज्यादा होता है चाहे वो किसी भी पार्टी का हो क्योंकि सदियों से हमारी मानसिकता इस तरह की बना दी गई है कि सदा लीक पर चलें। अपना वोट गढ्ढे  में न डाले। अब इस गढ्ढे  ने परेशान करके रखा हुआ है, आखिर यह गढ्ढा  है क्या?

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