घर की वो मुंडेर
रोज अलसुबह जब तुम सूर्य को अर्क़ देतीं
वो खिल उठता, किरणे कुंदन बना देतीं थी तुम्हे
एक दिव्य आभा प्रतिविम्बित होकर
खिड़की से मुझे सुबह होने का विश्वास दिलाती थी
मेरी शाम जब तुम तुलसी को दीपक रखती
पूरब-पश्चिम उसी खिडकी से अनवरत आते रहे।
उस अर्क से एक नन्हा सा पौधा चुप चाप पनप रहा था
नित एक कोपल इस दुनिया मे आती
मेरा मन तुमसे उस पोधे की भांति
सींचता सींचता कब लग गया
उस दिन पता चला जब वो मुंडेर
अचानक बड़ी हो गयी
वह पौधा और मेरा दिल सहोदर से
मौन पनपते रहे निशदिन
पोधे सा जीवनकाल दो चार साल
अब कुछ याद है तो वो
घर की मुँडेर।
चित्र साभार गूगल
ओपी सुमन
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