कैसे कविता लिखुँ इस धुप में
हर चेहरे पर तो नकाब पड़ा है
पहले नज़र मिलते ही कविता बन जाती थी
अब हर नज़र पर चस्मा पड़ा है
आज भी याद है मेरी पहली कविता
स्कूल से घर के रास्ते
धुप से व्याकुल हो जब उसने किताब से
चेहरे को ओटा था
मोती सी चमकती पसीनें की बूंदे
आब के लिए बेचैन शर्माती हुई सी रसना
अनायास बहार आती
सूखे लबों का तस्सली देकर फिर छुप जाती
बंधे हुए से कदम मानो गिनती के हों
समय को धोखा देती हुई सी
नज़रें जब मिलती थी
कविता बन जाती थी
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