हे ईश्वर मैं उस हर नियामत के लिए तेरा शुक्रगुजार हूँ जो तूने मुझे अता कि हैं

मेरे लिए सत्य यह है इस वक्त आप इसे पढ़ रहे हैं.......... धन्यवाद धन्यवाद धन्यवाद

Tuesday, April 22, 2014

 
कैसे कविता लिखुँ  इस धुप में
हर चेहरे पर तो नकाब पड़ा है
पहले नज़र मिलते ही कविता बन जाती थी
अब हर नज़र पर चस्मा पड़ा है

आज भी याद है मेरी पहली कविता
स्कूल से घर के रास्ते
धुप से व्याकुल हो जब उसने किताब से
चेहरे को ओटा था
मोती सी चमकती पसीनें की बूंदे
आब  के  लिए बेचैन शर्माती हुई सी रसना
अनायास  बहार आती
सूखे लबों का तस्सली देकर फिर छुप जाती
बंधे हुए से कदम मानो गिनती के हों
समय को धोखा देती हुई सी
नज़रें जब मिलती थी
कविता बन जाती थी

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