वो लह्मा आज भी रुलाता है मुझे,
जब जीवनभर का साथ तुमने माँगा था I
पर बेड़ियों ने कदम रोक लिए थे मेरे
आज वो बेड़ियां नहीं, हमराह भी नहीं
काश ! बेड़ियाँ टूटने का इंतज़ार कर लेता
समय से थोड़ा खिलवाड़ कर लेता
पर तेरे सवाल का जवाब क्या देता ?
तुमने तो हाँ या ना मैं मेरी जिंदगी समेट दी थी
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